
बदन-ए-ग़र्द में, मैं जड़ पकड़ता जा रहा हूँ
मैं खुद किरदार की पहचान बनता जा रहा हूँ
हूँ असीर-ए-उम्र आलम का, ये जाँ छूटे, क़रार आये।
(बदन-ए-गर्द: मिट्टी का शरीर; असीर-ए-उम्र: उम्रकैदी; आलम: दुनिया)
होंठ सुलगे जो मेरे, आग ज़माने में लगी
फिर से इक उम्र, सवालात् बुझाने मे लगी
’उस’ नाम-ए-आतिश का ज़ुबाँ से मेरी, रिश्ता क्या है?
*-*-*-*-*
मुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
खुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
*-*-*-*-*
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
(चित्र- विक्टर वासरली-ऑप्टिकल आर्ट)
मुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
ReplyDeleteखुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता
-वाह!!
और फिर
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
-बहुत खूब ढाला है आज को!! बेहतरीन!
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
ReplyDelete’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
भई वाह..
बहुत बहुत ही अच्छे! खास तौर से गूगल वाली त्रिवेणी।
ReplyDeleteसुंदर शब्द और गहरे भाव व्यर्थ हो जाते हैं यदि सरस्वती की कृपा नहीं होती. जहाँ तीनों हों, वहीं त्रिवेणी बनती है.
ReplyDeleteयहाँ, त्रिवेणी का अद्भुत नज़ारा देखने को मिला. ऐसा मनोहारी शब्द-चित्र कम ही देखने को मिलता है.
बदन-ए-ग़र्द में, मैं जड़ पकड़ता जा रहा हूँ
मैं खुद किरदार की पहचान बनता जा रहा हूँ
हूँ असीर-ए-उम्र आलम का, ये जाँ छूटे, क़रार आये।
...वाह!
मैं हमेशा अच्छी रचना पढ़कर ये सोचने लग जाता हूँ कि क्या टिप्पणी करूँ
ReplyDeleteजानलेवा...
ReplyDeleteमैं भी एक उम्र से अँगुलियों को दुःख देता हूँ और रज़िया बेग़म नाम की अपनी कोई दो दशक पुरानी दोस्त को खोजता हूँ गूगल कई चेहरे दिखाता है पर वो उसमे नहीं होती. अभी कुछ समय पहले अम्बाला के जवाहर नवोदय विद्यालय में प्राचार्य थी. मेरी खोज घोंघे की रफतार से है और दुनिया में भीड़ बढ़ती जा रही है. अपूर्व के लाख दीवाने है तो सोचा कि शायद यहं कोई उनको जानने वाला आ जाये तो मेरी रूह को आराम मिले.
हाय आराम... तूं इतना बेचैन होकर फिरता है ये तेरे नाम पे धोखा है. भाई त्रिवेणियां गजब है. कल मैं भी रज़िया के लिए कविताए लिखू तो पढ़ने जरूर आना, कविता रहने देते हैं कहानी ठीक रहेगी. जिसका काम उसी को साजे...
इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।
ReplyDeletebadhiyaa..triveniyaa
ReplyDeleteमुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
ReplyDeleteखुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
कसम से ....हम तो पहले कन्फेस कर चुके है के लोग पुरानियो को गूगल की खिड़की के सहारे खोजते है ....त्रिवेणी एक दम झकास है...पूरी कम्प्लीट .....
*-*-*-*-*
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
पंच मारा है मेरी जान .....ओर एक दम ठीक.....
दूसरी और तीसरी त्रिवेणी खास तौर पर पसंद आई।
ReplyDeleteमुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
ReplyDeleteखुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
wah , bahut khoob.
त्रिवेणी का शिल्प नहीं जानता , सो क्या कहूँ ..
ReplyDeleteहाँ जो भी लिखा है 'अपूर्व-छटा' बिखेर रहा है ..
सब एक से बढ़कर एक हैं पर यहाँ तो गजब ही है ---
''सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !! ''
.
तारीफ के लिए शब्द नहीं हैं मित्र ...
ये तो 'गूंगे का गुड़' है मेरे लिए ...खा तो ले पर बता न पाए
ReplyDeleteजनाब,
ReplyDelete......छीलते-छीलते खत्म हो गई जिन्दगी...|
बहुत खूब लिख गये भाई अपूर्व जी।
बिलकुल तुम्हारे नाम के अनुरूप!:-)
ReplyDeleteदुरुस्त फरमाया आपने.
ReplyDeleteअपूर्व,
ReplyDeleteअब तो दफ अतन की पोस्ट का इन्तजार करने लग जाता हूँ...बहुत नशीला लिखते हो...पहली दो त्रिवेनियाँ तो जानलेवा बन पड़ी है...शब्दों की खूबसूरती नजाकत और पिरोने का अंदाज लाजवाब है...तीसरी और चौथी त्रिवेणी में गूगल और शार्पनर कर प्रयोग अनूठा है...पर उतनी प्रभावोत्पादक नहीं है जितनी पहली दो है...हालाँकि उनकी श्रेष्ठता में कोई कमी नहीं है...बस जब भी पहली दोनों से तुलना होती है तो ही ऐसा लगता है...हालाँकि लोगों को इस अनूठे शब्दों के प्रयोग के लिए खूब पसंद आएँगी...
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ReplyDeleteगोया आज की सुबह ही हसीन है. कातिल भी... सबने seduce किया है... त्रिवेणी की आज नब्ज़ पकड़ी है... क्या गज़ब चीज़ होती है... ऐसे में डॉ. अनुराग आपको मेरी जान बुला लें तो कोई गलत नहीं मेरी जान... मैंने लिख ली सारी त्रिवेनियाँ...
ReplyDeleteपहली बार त्रिवेणी इतनी अच्छी लगी हैं ...
ReplyDeleteगूगल को तेरे नाम का चेहरा नहीं पता ये सही बात है , जिसको ढूंढो उसके अलावा सबका चेहरा दिखाता है ।
मुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
ReplyDeleteखुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
जिंदगी की हक़ीकत से जुड़ी त्रिवनियाँ हैं .......... आपका अंदाज़ आपको एक अलग पहचान देता है ....
अपूर्व जी ... आप बहुत बहुत समय बाद लिखते हैं जबकि हमें आपकी रचनाओं का इंतेज़ार रहता है ..... जल्दी जल्दी आया करें ........
हर त्रिवेणी पे अलग से कुछ कहा नहीं जा रहा.काफी सर खुजाया पर अफ़सोस के सभी अच्छी है के सिवा कुछ लफ्ज़ नहीं सूझे.इसलिए सोचा कम बोलने में ही भलाई है.
ReplyDeleteबात कम कीजे ,जहानत को छुपाते रहिये..
मुझे ये शिल्प अच्छा लगा,पहले जब अपने प्रिय पतों पर इस शिल्प में कुछ देखा है तो तीसरी लाइन तक आते आते सच में किसी जानलेवा की उम्मीद में दिल धड़कता है.
ReplyDeleteजिंदगी के कुछ अमूर्त या हर वक्त शब्दों की बाट जोहते भावों को इस अंदाज़ में पेश करने से उसका शब्दातीत होना खंडित नहीं होता.एक कवि के लिए ये निर्वाह भी ज़रूरी है.
बहुत मन के पास.
har triveni jaanleva...
ReplyDeleteहोंठ सुलगे जो मेरे, आग ज़माने में लगी
फिर से इक उम्र, सवालात् बुझाने मे लगी
’उस’ नाम-ए-आतिश का ज़ुबाँ से मेरी, रिश्ता क्या है?
wah!
बदन-ए-ग़र्द में, मैं जड़ पकड़ता जा रहा हूँ
ReplyDeleteमैं खुद किरदार की पहचान बनता जा रहा हूँ
हूँ असीर-ए-उम्र आलम का, ये जाँ छूटे, क़रार आये।
yah behatareen hai...
baki triveniyaan ekdam nayee si hain. jise khojna hai vah google ki zad mein nahin aur pencil sharp karne ka bhi fayda nahin.
कल पढ़ा था देर रात गये। ...तब कुछ कह नहीं पाया,अभी भी कुछ कहना संभव नहीं जान पड़ रहा है। नई विधा है और अंदाज़े-बयां भी बिल्कुल नया है...लेकिन जो भी है, है कातिलाना।
ReplyDeleteसोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
ReplyDelete’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
bahut hi umda
अब कहने को क्या बचा है सरकार!! २ -३ बार और पढ ले तो सुकू आये...
ReplyDeleteअब आ भी जाइये हुज़ूर!!!!!
ReplyDeleteए. आर. रहमान के संगीत की तरह इस पहली त्रिवेणी का नशा धीरे - धीरे चड़ने वाला है,
ReplyDeleteऔर फ़िर उतरे कब? ये जान छूटे तो करार आये...
मेरी Personal प्रिय दूसरी वाली....
होंठ सुलगे जो मेरे, आग ज़माने में लगी
फिर से इक उम्र, सवालात् बुझाने मे लगी
’उस’ नाम-ए-आतिश का ज़ुबाँ से मेरी, रिश्ता क्या है?
रिश्ता तो पता नहीं पर दो बातें, एक तो बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, हमने देखा है तजरुबा करके.... , और दूसरी वो नाम भी 'Self Destructive' आग ही होगी....
वाकई ये मेरी rash driving ही थी जो सबसे बेह्तेरिन २ त्रेवेनियों के ऊपर ज़ल्दी में कुछ कह दिया...
३)"तेरे नाम का चेहरा" ये वाक्यांश एक बहुत अलग तरीके से दिमाग में होंट करता है, 'गुलज़ाराना'
....इश्वर maybe?
4)और सच बताऊँ?
चौथी वाली में 'ए' (फॉर अपूर्व) Factor मिसिंग है...
अरे यही तो तो ए. र. रहमान के 'chiyaan -chaiyaan' की तरह 'instant hit. थी.
कुछ मीठा हो जाये....
ReplyDelete१) आपकी दूसरी त्रिवेणी को लिए जा रहा हूँ...
२) बेहतरीन अभिव्यक्ति बधाई.
३) ufffffffffffffffffffffffffff ......
४) निशब्द...
५) Nice !!
६)सागर जी और अनुराग जी की टिप्पणी को मेरी भी मानी जाये.
जोक्स अपार्ट जोक....
वापिस आता हूँ...
निशब्द कर देने वाला है हर लफ्ज़ ..बहुत देर तक आज सिर्फ आपका ही ब्लॉग पढ़ा अब इसके बाद और कुछ पढने का दिल नहीं हो रहा .शुक्रिया
ReplyDeleteआपने हो सकता है बताया हो कि आप कहाँ हैं...पर मुझे नहीं पता
ReplyDeleteया तो जल्दी लौटें या बताएं कि कहाँ हैं ???
मुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
ReplyDeleteखुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
अपूर्व जी जो बहुत सारी गूगल ने ढूढी ...उन्हीं में से जो सबसे प्यारी सी लगे मेरी ओर इनाम स्वरूप ....इन शानदार त्रिवेनियों के लिए .......!!
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सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
मीना कुमारी की शायद एक पंक्ति है ..
".ज़िन्दगी घड़ के देख ली हमने मिट्टी गारे की इक मूरत है "
कमबख्त ये छिलते छिलते ही तो खत्म हो जाती है ......और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
jordar racha
ReplyDeletebadhai
चौथी त्रिवेणी पढ़ कर एक एस ऍम एस याद आ रहा है (एवें ही) :
ReplyDelete"ज़िन्दगी में इतनी गलतियाँ न करो की पेंसिल से पहले इरेज़र ख़त्म हो जाये."
फ़िर गौतम सर की बात....
"वो कौन है जिन्हें...."
बहरहाल नया हो जाये कुछ अब?
होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें.
ReplyDeleteसोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
ReplyDelete’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
waah! Waah!! Waah!!!
sabhi triveniyan bahut achchee hain.
अपूर्व जी ....
ReplyDeleteआपको और परिवार में सब को होली की मंगल-कामनाएँ ....
ओह...... यहाँ गूगल भी है !!!
ReplyDeleteअद्भुत और अपूर्व है बन्धु !
ReplyDelete'त्रिवेणियाँ' मेरी लम्बी अनुपस्थिति में स्क्रीन पर चमकी होंगी और परदे के पीछे चली गईं ! आज 'दफ्तन' पर जा पहुंचा तो नज़र पड़ी ! हतप्रभ रह गया हूँ उन्हें पढ़कर--ये शब्द-शिल्प, ये सौष्ठव ! क्या बात है !! मंत्रमुग्ध हूँ ! 'बधाई' कम पड़ रही है, क्या लिखूं ? आपको 'आशीष' भेजने की हिमाकत कर सकता हूँ क्या ??
सप्रीत--आ.
बदन-ए-ग़र्द में, मैं जड़ पकड़ता जा रहा हूँ
ReplyDeleteमैं खुद किरदार की पहचान बनता जा रहा हूँ
हूँ असीर-ए-उम्र आलम का, ये जाँ छूटे, क़रार आये।
Pahli baar aayi hun aapke blogpe aur nishabd hun..
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
ReplyDeleteBhai wah.. ! Apne type ke aadmee lagte ho sahab.
Behtareen rachna.
तीन बार पढ़ चुका हूँ इस बीच ....
ReplyDeleteकुछ और लगाओगे कि नहीं?
..और फोन पे इतनी देर से किसके संग व्यस्त हो?
ReplyDelete@गौतम सर अपूर्व के ऊपर शक (मत) करें . वो मुझसे बात कर रहे थे.
ReplyDeleteऔर हाँ !! अब हम दोनों के ऊपर शक मत करें.
:)
@ अपूर्व भाई इससे पहले कि आप भूलें कि आप इंसान से पहले एक ब्लॉगर हैं एक नयी पोस्ट डाल दें.
नहीं नहीं वैसे मुझे तो ख़ुशी ही होगी आपकी पोस्ट नहीं आएगी तो, लोग हम जैसों के ऊपर भी टाइम देंगे...
तो कोई बात नहीं मैं ४-५ महीने और इंतजार (ख़ुशी ख़ुशी ) कर लूँगा.
वापिस आता हूँ इस उम्मीद के साथ कि अब भी कोई पोस्ट नहीं आई.
आमीन .
:D
apoorva ji.....apki lekhan shaili wakai laajawab hai....ek ek alfaaz chhoo lene wala
ReplyDeleteसोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!.....life ki philosopy
मुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
खुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।......bebasi.........kya baat hai
dev sahab ...aapne jis anjaad me apoorva ji ki taarif ki h ......ese lagg ra tha ...khud heera apne hi bajaar me heere ki keemat jaanne nikla h.......iss baat se anjaan k vo khud bhi ek Beskeemti heera h...........headz off both or u
ReplyDeleteहोंठ सुलगे जो मेरे, आग ज़माने में लगी
ReplyDeleteफिर से इक उम्र, सवालात् बुझाने मे लगी
’उस’ नाम-ए-आतिश का ज़ुबाँ से मेरी, रिश्ता क्या है?
मेरी जुबान से जो सच्ची या तल्ख़ बातें निकली तो जमाने को आग लग गयी मतलब सह नहीं पाए लोग,फिर उनको जवाब देने में मुझे इक उम्र लग गयी.उस आग का और मेरी जुबान का रिश्ता क्या है..
बदन-ए-ग़र्द में, मैं जड़ पकड़ता जा रहा हूँ
ReplyDeleteमैं खुद किरदार की पहचान बनता जा रहा हूँ
हूँ असीर-ए-उम्र आलम का, ये जाँ छूटे, क़रार आये।
बदन में रूह फिट बैठती जा रही है.अपने किरदार को perfectly play कर रही है,जैसे मुकेश को लोग शक्तिमान के नाम से जानते है .इस उम्र कैद के छूटने से ही करार आयेगा.
बहुत दफा आया और जैसा कि 80% लोग करते है पढ् कर लौट गया कभी कभी दिन मे कई बार.
ReplyDeleteपर अबकी आर गूगल वाली त्रिवेनी पढी . यकीन करो इसी लिये यहाँ हूँ. बहुत उम्दा. कहीँ और चल गया हूँ. फिलहाल इस खुमार से निकलूँ तो बातेँ हो ......
सत्य
Aap ka naam theek hi hai...nahi, sateek hi hai..
ReplyDeletenahi, kuchh aur ho sakta hi nahi tha...Apoorv
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!
chupchap rahun...bhala ho mera
"मुझसे छुपा के, उंगलियाँ खोजती हैं तमाम शब
ReplyDeleteखुलती हैं हजार खि़ड़्कियाँ, पर उनमें तू नही
’गूगल’ को तेरे नाम का, चेहरा नही पता ।
सोचा था, हर सवाल का लिखेंगे खूबसूरत जवाब
’शार्पनर’ से बार-बार नोकीला भी किया उसे
और छीलते-छीलते ही खत्म हो गयी ...जिंदगी !!"
क्या कहें बस , कभी गुलज़ार इन्हें पढ़ें तो आपके हाथ चूम लें :-)
Bandhu....
ReplyDeleteLoved your ideology.....
Aapke blog ka pta !next se laga.
Taarife thi par socha na tha ki itni kam hongi......
Aapko FACEBOOK pe apni mitr mandali me pesh karne ki izazat chahta hoon....
Aap likhe aur hame zindagi ke dard,rang se parichit karwate raahe ...
Sukriya........
Lovely updates,
ReplyDeletemujhe hindi type karne nahi aati (matlab ye nahi ki hindi samajh me nahi aati/hindi padhne ka shauk bhool gaya)
umar kuch jyada nahi hai meri....
Pichle mahine 18 ka ho gay.
Par aapke blog pe aake dil ke sare dard, sare goobar, zindagi ki sari hakiqat nazar me aa jati hain.
Kisi ek rachna ke baare me kya kahoo, sab lajawab hain.
Yha to kitne hi bade baithe hai to main chupke se hi aapki rachnaye padh ke nikal leta hoo.
(Bado ke samne bacche jyada nahi bolte)
jo bhi ho....
Lovely
and waiting for further ones,
thanks Apoorva Sir.
For making blogging serious and clean.
Best of luck.