Thursday, December 17, 2009

समय की अदालत में



क्षमा कर देना हमको
ओ समय !
हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
हमारे अपराध के लिये
कि बस जी लेना चाहते थे हम
अपने हिस्से की गलीज जिंदगी
अपने हिस्से की चंद जहरीली साँसें
भर लेना चाहते थे अपने फेफड़ों मे
कुछ पलों के लिये ही सही
कि हमने मुक्ति की कामना नही की
बचना चाहा हमेशा
न्याय, नीति, धर्म की परिभाषाओं से
भागना चाहा नग्न सत्य से.

कि हम अपने बूढे अतीत को
विस्मृति के अंधे कुँए मे धकेल आये थे
अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
बॉटम्स अप !
कि हम बस जी लेना चाहते थे
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से की जमीन
अपने हिस्से की खुशी
नहीं बाँटना चाहते थे
अपने बच्चों से भी

कि हम बड़े निरंकुश युग मे पैदा हुए थे
ओ समय
उस मेरुहीन युग में
जहाँ हमें आँखें दी गयी थीं
झुकाये रखने के लिये
इश्तहारों पर चिपकाये जाने के लिये
हमें जुबान दी गयी थी
सत्ता के जूते चमकाने के लिये
विजेता के यशोगान गाने के लिये
और दी गयी थी एक पूँछ
हिलाने के लिये
टांगों के बीच दबाये रखने के लिये

कि जिंदगी की निर्लज्ज हवस मे हमने
चार पैरों पर जीना सीख लिया था
सीख लिया था जमीन पर रेंगना
बिना मेरु-रज्जु के
सलाखों के बीच रहना,
कि हमें अंधेरों मे जीना भाता था
क्योंकि सीख लिया था हमने
निरर्थक स्वप्न देख्नना
जो सिर्फ़ बंद आँखों से देखे जा सकते थे
हमें रोशनी से डर लगने लगा था
ओ समय !

जब हमारी असहाय खुशियाँ
पैरों मे पत्थर बाँध कर
खामोशी की झील मे
डुबोयी जाती थीं,
तब हम उसमे
अपने कागजी ख्वाबों की नावें तैरा रहे होते थे

ओ समय
ऐसा नही था
कि हमें दर्द नही होता था
कि दुःख नही था हमें
बस हमने उन दुःखों मे जीने का ढंग सीख लिया था
कि हम रच लेते थे अपने चारो ओर
सतरंगे स्वप्नो का मायाजाल
और कला कह देते थे उसे
कि हम विधवाओं के सामूहिक रुदन मे
बीथोवन की नाइन्थ सिम्फनी ढूँढ लेते थे
अंगछिन्न शरीरों के दृश्यों मे
ढूँढ लेते थे
पिकासो की गुएर्निक आर्ट
दुःख की निष्ठुर विडम्बनाओं मे
चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
और यातना के चरम क्षणों मे
ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे कर
सुला दिया था हमने
हमारे आत्माभिमान ने खुद
अपना गला घोंट कर आत्महत्या कर ली थी

हम भयभीत लोग थे
ओ समय !
इसलिये नही
कि हमें यातना का भय था,
हम डरते थे
अपनी नींद टूटने से
अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे
अपनी कल्पनाओं का हवामहल
ध्वस्त होने से हम डरते थे,
उस निर्दयी युग मे
जब कि छूरे की धार पर
परखी जाती थी
प्रतिरोध की जुबान
हमें क्रांति से डर लगता था
क्योंकि, ओ समय
हमें जिंदगी से प्यार हो गया था
और आज
जब उसकी छाया भी नही है हमारे पास
हमें अब भी जिंदगी से उतना ही प्यार है

हाँ
हमे अब भी उस बेवफ़ा से उतना ही प्यार है !



(हिंद-युग्म पर पूर्वप्रकाशित)

(चित्र: गुएर्निका-पिकासो)

48 comments:

  1. तुम्हारे लौटने पर सुकून पहुंचा...बाकी फिर कभी लिखूंगी.

    ReplyDelete
  2. आप वापस आ गये, बहुत ही प्रसन्नता हुयी । कविता के बारे में क्या लिखूँ ………………

    ReplyDelete
  3. अपूर्व,
    सबसे पहले वापस आने के लिए बड़ी हूँ फिर भी शुक्रिया कह रही हूँ,
    अच्छा लगा तुम्हें देख कर,
    और कविता....!!
    यह तुम्हारा सच है और ज़रूरी नहीं कि यही सही हो,
    कुछ सच औरों के भी हो सकते हैं,
    ये कैसे सोच लिया कि वो उतना सच नहीं.....या सही नहीं है ??
    भ्रम है तुम्हारा कि सभी कापुरुष है, मेरु-दंड विहीन लोग हैं , लेकिन सभी नहीं,
    कुछ अंतरात्मायें और भी हैं, जो अपने सच के साथ जी रहीं हैं...
    एक बात और मौन कि भी अपनी भाषा होती है ...ज़रुरत है समझने की...
    अपनी जगह से खड़े होकर सिर्फ अपनी दो-जोड़ी आंखों से किसी चीज़ को देखने पर वही दिखाई देती है जो हम देखना चाहते हैं,
    कभी-कभी दूसरे के नज़र से देखने पर कुछ blind spots समझ में आ जाते हैं....
    दुनिया उतनी भी बुरी नहीं और लोग इतने भी निर्लज्ज नहीं जितना तुमने यहाँ कह दिया है ....वर्ना तुम लौट कर क्यूँ आते ...:):)

    Didi...

    ReplyDelete
  4. हिन्द युग्म पर पढ़ा था, बहुत गहरे भाव!!



    वापसी का निर्णय सुखद है. स्वागत है. नियमित लिखें. शुभकामनाएँ.

    ReplyDelete
  5. उफ़ ..बहुत सशक्त -कराहती मानवता का ईमानदार कंफेसन !
    उत्कृष्ट रचना .बधाई !

    ReplyDelete
  6. वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

    ReplyDelete
  7. बहुत बहुत शुक्रिया अदा दी, आपके स्नेह और शुभेच्छाओं के लिये
    यह कविता कुछ पुरानी थी, और युनिप्रतियोगिता मे चयनित हुई थी हिंद-युग्म पर. उसमे दो-चार पंक्तियाँ हटा दी थी पहले. सो इस बार पूरी कविता को चेपना चाहता था ब्लॉग पर.
    सच कहूँ तो यह कविता जब लिखी थी तो मेरा अपना कन्फ़ेशन-स्टेटमेंट बना कर लिखी थी. हम अपने आसपास समाज और देश मे इतनी विसंगतियाँ और समस्यायें देखते रहते हैं, और फिर रोजी-रोटी के काम मे लग जाते हैं, सब कुछ भूल कर. और फिर अपनी छोटी सी दुनिया बना कर मस्त हो जाते हैं. मैं भी पहले दुनिया मे बदलाव लाने के सपने देखा करता था. और अब बाकी सबके दुख भूल कर अपनी जिंदगी को सुखकर, और सुख कर बनाने मे जुटा रहता हूँ, और इसे अपनी मजबूरी कह देता हूँ. यही बात मन के अंतरतम मे जो गिल्ट पैदा करती है, यह रचना उसी की अभिव्यक्ति है बस. दुनिया और भविष्य को बेहतर बनाना हमारी सामूहिक और सामाजिक जिम्मेदारी है. और उसके लिये कुछ सेक्रिफ़ाइस देने के लिये भी तैयार रहना चाहिये. मगर मुझे लगता है कि मैं जिंदगी और अपनी छोटी से दुनिया से इतना प्यार करने लगता हूँ, कि बाकी समाज या देश के लिये कोई रिस्क नही लेना चाहता. और ऐसा करने के लिये तर्क भी गढ़ लेता हूँ, खुद को सही साबित करने के लिये. अपने स्वार्थ की बेड़ियों को मजबूरी का नाम दे कर.
    बस यही एक व्यक्तिगत करुण भावाभिव्यक्ति है, अब शाश्वत जैसी.

    ReplyDelete
  8. कविता पहले पढ़ी थी कविता के बारे में आज पढ़ा.... दोनो शानदार..
    कविता से अधिक ब्लाग की चहकते देख कर खुशी हुई।

    ReplyDelete
  9. यह वापसी सुख दे गया.

    ReplyDelete
  10. कभी कभी कवि बहुत भावुक होकर समय के भीतर घुसकर लिखता है ....कभी तटस्थ दृष्टि से समय को देख कर ...विद्रूप वास्तविकताये ओर जादूइ यतार्थ दोनो की अपनी खूबिया भी है ओर खतरे भी .....यहाँ ऐसा लगा जैसे तुम भीतर हो समय के... निराशावादी ज्यादा है...
    तुम्हारी कविता पढ़कर कैलाश वाजपाई जी की एक कविता याद आई .. ..पंक्ति दर पंक्ति तो याद नहीं है पर कुछ कुछ ऐसी थी ......

    दरअसल/
    हम बहुत बड़े ढोंगी थे /
    अपने समय के /
    यूं विद्रोही थे /
    पर पूंछ भी हिलाते थे /
    सत्ता की /
    बुद्धिजीवी थे /
    पर घायल थे

    ReplyDelete
  11. तुम आये तो बहारों में....

    अच्छा लग रहा है अपूर्व तुमको वापस यहाँ उसी तेवर में देखकर। कविता के लिये फिर से, अलग से आता हूँ।

    ReplyDelete
  12. प्रिय अनुज...अपूर्व.... बहुत अच्छा लगा तुम्हे देख कर..... मैं तुम्हे और तुम्हारी लेखनी को बहुत मिस कर रहा था.... इतनी सुंदर और बेहतरीन कविता के साथ वापसी के लिए बहुत बहुत बधाई.....

    ReplyDelete
  13. बहुत बढ़िया सामयिक रचना है बधाई।

    ReplyDelete
  14. शानदार रचना. कृपया हिंद युग्म के कवि सम्मलेन के लिए इसे रिकॉर्ड करके भेजें......

    ReplyDelete
  15. अपूर्व भाई !
    कारवां जो सूना सा दिख रहा था , आपके आने से
    भरा - भरा दिखने लगा ..
    ' लौट के आये कई मीत ' , और कविता के साथ !
    गोया , आश्वस्ति इंसानों में लौट के आ रही हो ..
    यह कविता मैं पहली बार पढ़ रहा हूँ और कविता
    के प्रभाव को महसूस रहा हूँ ..
    निस्संदेह एक श्रेष्ठ और साहसी रचना को पढ़ने का मौका मिला ..
    धूमिल की याद आयी और उन्हीं - सी साफगोई दिखी ---
    '' हम चाहते हैं
    विरोध में उठे हाँथ की मुट्ठी भी कसी रहे ,
    और
    कांख भी न दिखे '' ( स्मृति के आधार पर ) |
    हो सकता है आपकी यह कविता कुछ काव्य-प्रेमियों को आस्वादद न लगे , पर
    यह साफगोई अ-त्याज्य है , क्योंकि ---
    '' साहित्य का कार्य लघुता की और साहित्यिक दृष्टिपात भी है '' |
    मैं तो यही चाहूँगा कि यह कहने का साहस ( और सुनने का भी ) हिन्दी
    काव्य - जगत में सदैव बना रहे ---
    '' हम भयभीत लोग थे
    ओ समय !
    इसलिये नही
    कि हमें यातना का भय था,
    हम डरते थे
    अपनी नींद टूटने से
    अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे ''

    ReplyDelete
  16. अपूर्व जी .......... आप को दुबारा देख कर बहुत अच्छा लग रहा है ......... आपकी रचना तो हमेशा कमाल की होती ही है ..... कई बार मन की संवेदनाएँ इंसान को विमुख करने की कोशिशें करती हैं ......... पर आपने उन पर काबू पा लिया ये सबसे बड़ी जीत है आपकी ...........

    ReplyDelete
  17. अपूर्वजी,
    ये महज़ कविता नहीं, समय और साहित्य का अनोखा दस्तावेज़ है-- अप्रतिम ! धूमिल और भारतभूषण एक साथ याद आये ! कटाक्ष और तर्क के बीच नकारात्मक vaakya रचनाओं में गुंथा हुआ तीखा व्यंग्य ! आपकी इस कविता से कुछ उधृत करना चाहूँ तो पंक्ति-पंक्ति उठानी पड़ेगी ! कह सकता हूँ, मेरी दृष्टि में इस कविता ने आपको बहुत ऊँचा स्थान दिया है !
    उम्र में बड़े होने के अधिकार से लिखता हूँ--'सप्रीत', आनंद.

    ReplyDelete
  18. आमद का शुक्रिया.कविता पर ज़रूर लौटता हूं.

    ReplyDelete
  19. कविता के लिए मन का होना आवश्यक है आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर समझ आया है.
    सुरों की पेटियां, समय की अदालत, आज फिर, अभी वक्त था और कुछ दुःख इन पांच कविताओं को कितनी बार पढ़ा है, याद नहीं आता. सबका आभार व्यक्त करने को जी चाहता भी है और नहीं भी. दोस्तों आप सब हमेशा बने रहो. यूं रेगिस्तान में दरख़्त भी बहुत दूर दीखते हैं तो नर्म नाजुक लोग मुद्दतों बाद ही मेहमान हुआ करते हैं.

    ReplyDelete
  20. चाहे पहले लिखा हो या अभी.. ये लिखावट तुम्हारी समकालीन रहेगी.. गहरे तक उतरा है एक एक शब्द.. तुम्हे भी बताऊंगा कैसे, पर फुर्सत से..

    ReplyDelete
  21. आप वापस आये । हर्षित हूँ ।
    हिन्द युग्म पर पढ़ी थी यह रचना - पर यहाँ जरूरत थी इसकी । जरूरी, और जैसा कुश ने कहा -सदैव समकालीन !

    ReplyDelete
  22. कमाल की कविता है,या कहूं एक लय पर धौंकनी की तरह चलती सांस.
    एक बहुत मामूली समय में दुर्लभ कविता.इसके असर में सब कुछ पिघल कर लिजलिेजा सा होते देखता हूं.

    ReplyDelete
  23. अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
    वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
    बॉटम्स अप !
    Ye kai paripekshya main 'Samayik' hai.

    'AIDS' , 'Lung Cancer' , 'Finical Crises' and 'Emotional Crises' isi kacchi sharab ke jahriley vinegar(derivative) hain.

    'चंद पलों' aur 'बॉटम्स अप' ! aapas main ek doosre ke poorak hain...
    Shuru hote hi khatam types aur consequences life long.

    to dost aap choti kavita nahi likh paate ye bhram galat hai aapka.

    ReplyDelete
  24. हमें अब भी जिंदगी से उतना ही प्यार है
    बहुत खूब ।

    ReplyDelete
  25. फिर से आया था कविता को गुनने। अपनी पूरी कवितामय पूर्णता के साथ रचना अजब तरीके से कचोटती है और शायद जिसे अपूर्व की लेखनी ही एक सार्थकता दे सकती थी...दे रही है।

    वैसे शायद अपनी व्यक्तिगत पसंद के मुताबिक मैं किसी विदेशी बिम्बों को ज्यादा तरजीह न दूँ, भले ही बिथोविन को करोड़ों बार सुन चुका हूँ...लेकिन तुम्हारी कविता में ये बिम्ब फ़ब रहे हैं।

    ReplyDelete
  26. कोई सुनियोजित योजना थी क्या... दर्पण और आप दोनों एक साथ ब्लॉग लिस्ट में दिख रहे हो :)

    खैर...

    हो सके तो मुझे इत्ते से काम पर रख लो,
    कि
    ..........................................
    ...............

    अरे हमने खून होते देखा था उसका मुझे क्यों नहीं बुलाया समय कि अदालत में... मैं चश्मा से देखने वाला (चश्मदीद) गवाह हूँ भाई...

    ReplyDelete
  27. Hi, thoroughly enoyed reading this. I have been living in travelling across the country for work, and have been meeting a lot of the 'poor' for various reasons and in various ways. And have been very angry with myself for doign what I do, with this government, and its even worse for me because of the absolutely repressive state of Gujarat that I live in.

    I feel such anger is a natural response to the on-going structural and systemic violence that is only going to intensify. And unfortunately, we are all as unimaginative about it! Not one stroke of resistance, not one of mass resistance, of dreams. And I think much of it comes from the personal/public divide that the global capitalism only intensifies over time.

    Keep writing, that is after all, the only thing to do, the only imagination we are allowed to have...

    ReplyDelete
  28. fir se padhna sukhad raha.. Apoorv ji
    Jai Hind

    ReplyDelete
  29. अपूर्व जी ,

    शुक्रिया आने के लिए .....आपको दोबारा देख राहत हुई .......वर्ना कई बार मन आपके ही रास्तों पे चलने को हुआ .....रचना बहुत से सवाल लिए खड़ी है ......शायद वक़्त इन सब का जवाब दे .....!!

    ReplyDelete
  30. कि हम अपने बूढे अतीत को
    विस्मृति के अंधे कुँए मे धकेल आये थे
    अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
    वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
    ...Yah kuch baat hai jo drishtigochar hoti rahti hai.

    ReplyDelete
  31. ik lambi or mushkil kavita.achhi ya buri nahi bas ik kavita.
    हम डरते थे
    अपनी नींद टूटने से
    अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे
    अपनी कल्पनाओं का हवामहल
    ध्वस्त होने से हम डरते थे,
    kyunki hum insaan hai khuda nahi.
    kahi padha tha kuch is kavita se nahi milta bas likh rahi hun
    yun hi..
    meri nazar me
    adhure khuda ka naam insaan hai.
    or pure insaan ka naam khuda hai.
    jo kuch bhi galat hai,wo isliye hai
    ki uske liye bahut jagah hai-adhurepan me.
    pure me uske liye jagah nahi hai.
    isliye insaan khuda se dua mangta hai.
    ik adhurapan pura hone ki dua mangta hai.

    ReplyDelete
  32. Apoorva ji, aapki ye kavita poori nahi padh pa raha...pahle stanza men hin kuch gleez sa lagne lagta hai sonch kar aur fir sonch men hin doob jata hoon.

    vaakai drishya hone lagta hai sab kuch jindgi ki un patli galiyariyon ki cheejen..jahan dher saara kachra hai...

    ReplyDelete
  33. अगर मैं यह कहूं कि यह रचना मैने पढ रखी है तो ठीक नहीं होगा क्योंकि जब पढी थी तो अपूर्व से तार उतने सधे नहीं थे जितने उनके ब्लोग पर आकर और लगभग लगातार पढकर सधे हैं, दूसरा कारण यह कि जब पढी थी तो सिर्फ पढी थी, अब इसमे उतरा हूं। गहरे तक, समय निकालकर। सच कहूं तो चाहता हूं लम्बी चौडी टिप्पणी दूं, पर नहीं दूंगा अन्यथा इतनी बेहतरीन रचना का मज़ा जाता रहेगा। मुझे तो फिर पढ्ना है, सोचना है और इन शब्दों के साथ खेलना है।
    पिकासो की गुएर्निक आर्ट
    दुःख की निष्ठुर विडम्बनाओं मे
    चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
    और यातना के चरम क्षणों मे
    ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
    जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
    कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

    कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे कर
    सुला दिया था ........
    -टिप्पणी कैसे लिख सकता हूं बन्धु...,..।

    ReplyDelete
  34. "कि बस जी लेना चाहते थे हम
    अपने हिस्से की गलीज जिंदगी"

    आह कितना सच..!

    "अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
    वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
    बॉटम्स अप !"

    इतना सटीक ना लिखा करो यार..! कोई अधेड़ कसमसाके एक गिलास ठंडा पानी मांगेगा..!

    "जब हमारी असहाय खुशियाँ
    पैरों मे पत्थर बाँध कर
    खामोशी की झील मे
    डुबोयी जाती थीं,
    तब हम उसमे
    अपने कागजी ख्वाबों की नावें तैरा रहे होते थे"

    च..च..फिर वो नाव भीग जाती रही..और हम कपियाँ फाड़ दूसरे गोजे हुए पन्ने निकालते थे नावें बनाने के लिए ख्वाब की..एक बार फिर आँखें झुकाये हुए..है..ना..!

    "और यातना के चरम क्षणों मे
    ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
    जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
    कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;"

    हाँ रे हम श्वान से इंसान..!

    "हाँ
    हमे अब भी उस बेवफ़ा से उतना ही प्यार है !"

    प्यार तो है..तभी तो..हर तरफ सूख रही है तेज धूप मे बिखरी हुई गीली कागज की ख़्वाबों वाली नावें..!

    ReplyDelete
  35. कविता लम्‍बी और बहुत बेहतरीन है इन अर्थों में कि हमारा जीवन किस स्‍तर पर चलता है उस सत्‍य को उदघाटित करती है ।
    मनुष्‍य हर शर्त पर जीना चाहता है , सुविधापूर्वक । जीने के लिए मरने वाले विरले ही होते हैं । पतन की वजह ऐसे विरले लोगों का भी गायब हो जाना है । औसत आदमी में तो लगभग हमेशा ही एक जैसा होता है । नायको का अनुसरणकर्त्‍ता ।

    ReplyDelete
  36. बस हमने उन दुःखों मे जीने का ढंग सीख लिया था
    कि हम रच लेते थे अपने चारो ओर
    सतरंगे स्वप्नो का मायाजाल
    और कला कह देते थे उसे
    कि हम विधवाओं के सामूहिक रुदन मे
    बीथोवन की नाइन्थ सिम्फनी ढूँढ लेते थे
    अंगछिन्न शरीरों के दृश्यों मे
    ढूँढ लेते थे
    पिकासो की गुएर्निक आर्ट
    दुःख की निष्ठुर विडम्बनाओं मे
    चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
    और यातना के चरम क्षणों मे
    ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
    जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
    कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

    lekhnee ka aisa kamaal pahli baar dekh raha hun..

    ReplyDelete
  37. एक बार कविता पढ़ चुका हूँ इस बेहतरीन कविता का पुर्नपाठ भी कही से पुराना नही लगा ..बहुत ही सुंदर भाव संजोया है आपने इस खूबसूरत कविता में जिस ने आपको हिन्दयुग्म की यूनिकविता प्रतियोगिता में शीर्ष स्थान दिलाया था...एक प्रतियोगिता ही नही आप हज़ारों-लाखों पाठकों का दिल भी जीत गये है इस भावनात्मक कविता के द्वारा....धन्यवाद अपूर्व जी...

    और नये साल की अग्रिम शुभकामनाएँ......

    ReplyDelete
  38. खुबसूरत रचना आभार
    नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं ................

    ReplyDelete
  39. अपूर्व जी पहली बार आई आपके ब्लॉग पर । कविता पढी । इतना अपने आप को छील कर रख देना चौंका गया और अच्छा भी लगा । हम राह निकालने के लिये कैसे भी समझौते कर लेते हैं जिंदगी से प्यार जो है । पर फिर क्या ये जिंदगी है ।

    ReplyDelete
  40. अच्छा किया जो वापस आये। यह कविता लम्बे विमर्श की मांग करती है। फ़िर से पढ़ा जायेगा। फ़िर से सोचा जायेगा।

    ReplyDelete
  41. शायद आप ही हैं अपूर्व जी, जिनका जिक्र हरकिरत ने मेरे ब्लॉग पर करके मुझे कुछ तलाशने के लिए मजबूर कर दिया। आपनी रचना पढ़कर तो मुझे कुछ ऐसा ही लगा जैसे कि मेरी तलाश यहाँ एक बार तो खत्म हो गई। क्या खूब लिखते जनाब..अब तो आना ही पड़एगा।

    ReplyDelete
  42. APOORV JI,
    BAHUT SUNDAR KAVITA HAI...ABHI PADHI HAI...BAHUT ACHCHHI LAGI PAR TIPPNI KE LIYE FIR VAAPS AATA HOON!
    PRAKASH

    ReplyDelete
  43. अनूप सर ने फ्यूचर टेंस में बात कर दी है... जो इस बात का प्रमाण है की इसे फुर्सत से चर्चा में बांचा जायेगा... कथा सुनने हम जैसे बेवड़े भी होंगे... जो बीच-बीच में धर्म की जय हो और अधर्म का नाश को नारा भी लगते रहेंगे... लो जी हम भी फ्यूचर टेंस में बोलने लगे... लगता है दोनों मूडी आदमी हैं... ;).).)

    ReplyDelete
  44. कुश ने आपकी इस कविता को एक टिप्पणी में कोट किया था. आज पूरी कविता पढी. और खुद को भाग्यशाली समझ रहा हूँ कि मैं यहाँ आया.

    ReplyDelete
  45. सीख लिया था....निरर्थक स्वप्न देखना....वाह

    ReplyDelete
  46. अपूर्वजी, क्या लिखा है आपने. लगता है किसी ने हमारी आत्मा को भी झकझोर दिया जो की हम खुद समझ बैठे थे शायद जीवन की इस रेलमपेल में हमसे पहले ही वीरगति को प्राप्त हो चुकी.

    ReplyDelete
  47. हैलो हूँ श्रीमती, डेबरा मॉर्गन हूँ वैध और विश्वसनीय ऋण ऋणदाता ऋण देने के लिए बाहर
    2% ब्याज दर पर एक स्पष्ट और समझने के नियम और शर्तों पर। से
    $ 12,000 करने के लिए $ 7,000,000 अमरीकी डालर, यूरो और पाउंड केवल। मैं, व्यापार ऋण देने के लिए बाहर
    व्यक्तिगत ऋण, छात्र ऋण, कार ऋण और ऋण बिलों का भुगतान करने के लिए। अगर आप
    आप सीधे मुझसे संपर्क करने के लिए आप क्या करना है एक ऋण की जरूरत है
    में: morgandebra816l@gmail.com
    भगवान आपका भला करे।
    सादर,
    श्रीमती डेब्रा मॉर्गन
    ईमेल: morgandebra816@gmail.com


    नोट: MORGANDEBRA816@GMAIL.COM: सभी उत्तर के लिए भेज दिया जाना चाहिए

    ReplyDelete

..क्या कहना है!

Related Posts with Thumbnails