Wednesday, January 20, 2010

बसंत का गीत




कौन सा
अनजाना गीत है वह
जिसे
चैत्र की भीगी भोर में
चुपके से गा देती है
एक ठिगनी, बंजारन चिड़िया
विरही, पत्र-हीन, नग्न वृक्ष
के कानों मे
कि गुलाबी कोंपलों की
सुर्ख लाली दौड़ जाती है
उदास वृक्ष के
शीत से फटे हुए कपोलों पे
और शरमा कर
नये पत्तों का स्निग्ध हरापन
ओढ़ लेता है वृक्ष
खोंस लेता है जूड़े मे
लाल-पीले फूलों की स्मित हँसी
लचकती, पुनर्यौवना शाखाओं को
कंधों पर उठा कर
समुद्यत हो जाता है
उत्तप्त ग्रीष्म के दाह मे
जलने के लिये
क्रोधित सूर्य के कोप से आदग्ध
पथिकों को
आँचल मे शरण देने के लिये

सिर्फ़ बसंत मे जीना
बसंत को जीना
ही तो नही है जिंदगी
वरन्‌
क्रूर मौसमों के शीत-ताप
सह कर भी
बचाये रखना
थोड़ी सी सुगंध, थोड़ी हरीतिमा
थोड़ी सी आस्था
और
उतनी ही शिद्दत से
बसंत का इंतजार करना
भी तो जिंदगी है

हाँ यही तो गाती है
ठिगनी बंजारन चिड़िया
शायद!

( हिंद-युग्म पर पूर्वप्रकाशित)

Wednesday, January 6, 2010

गुमशुदा चीजों के प्रति




तमाम गैरजरूरी चीजें
गुम होती जाती हैं घर मे, दबे पाँव
हमारी बेखबर नजरों की मसरूफ़ियत से परे
जैसे बाबू जी की एच एम टी घड़ी
अम्मा का मोटा चश्मा
उनके जाने के बाद
खो जाते हैं कहीं
पुराने जूते, बूढ़े फ़ाउन्टेन पेन, पुरानी बारिशों की गंध
हमारी जिंदगी की अंधी गलियों मे

हर जगह कब्जा करती जाती हैं
हमारी चौकन्नी जरूरतें, लालसायें
अलमारी मे
पीछे खिसकती जाती हैं
करीने से रखी कॉमिक्स, जीती हुई गेंदे,
पुरानी डायरीज्‌, मर्फ़ी का रेडियो
बिस्मिला खाँ

शायद
किसी भूली हुई पुरानी किताब मे
आज भी सहेजे रखे हों
किसी बसंत के सूखे फूल, तितलियों के रंगीन पर, एक मोरपंख,
बचपन के साल
किसी कोने मे औंधा लेटा हो, रूठा हुआ
धूल भरा गंदला टैडी बियर
सालों लम्बी उम्मीद मे
कि कोई मना लेगा कर उसे

या अभी भी किसी बंद दराज मे रखे हों, सुरक्षित
कँवारे डाकटिकट, एंग्री यंग-मैन के स्टिकर्स, टूटी बाँसुरी,
पच्चीस पैसे के सिक्के,
नीली मूँछों वाली मुस्कराती माधुरी दीक्षित,
बहन से छीना बबलगम
ढूँढ लिये जाने की बाट जोहते हुए

शायद
किसी गुफ़ा मे आज भी टंगा हो
सोने के पिँजड़े मे बन्द तोता
जिसमे थी उस भयानक राक्षस की जान
जिससे डरना हमें अच्छा लगता था

दुनियादारी के मेले मे
एक-एक कर बिछड़ते जाते हैं हमसे
बचपन के दोस्त, लूटी हुई पतंगें, जीते हुए कंचे
रंगीन फ़िरकियाँ, शरारती गुलेलें
परी की जादुई छड़ें

मकानों के कंधों पे सवार मकानों के झुण्ड मे
अब नही उझकता है, छत पर से चालाक चंदा
अब नही पसरती आँगन मे, जाड़े की आलसी धूप
धुँधले होते जाते हैं धीरे-धीरे
बाबा की तस्वीर के चटख रंग
दादी की नजर की तरह
हमारी आँखों को परिधि से परे

ख्वाबों के रंग बदलते जाते हैं एक-एक कर
बदलते मौसमों के साथ
बदलती जरूरतों के साथ
और एक-एक कर
आँखों की देहलीज से बाहर चले जाते हैं, सिर झुकाए
गुजिश्ता मौसमों के रंग
कुछ महकते हुए रूमाल
खट्टी इमली का चरपरा स्वाद

हमें घेर कर रखता है टी वी का कर्कश शोर
और हमारे जेहन की साँकलें बजा कर लौट जाती हैं वापस
जाने कितनी पूनम की रातें
पूरब की कितनी वासंती हवाएं
चैत्र की कितनी ओस-भीगी सुबहें
बेसाख्ता बारिशें
लाल घेरों मे कैद रह जाती हैं तारीखें
और बदल दिये जाते हैं कैलेंडर


दरअस्ल
यह विस्मृति का गहरा रिसाइकल बिन है
आपाधापी का गहन ब्लैक-होल
जिसमे समाती जाती हैं सारी गैर-जरूरी चीजें
और हमें खबर नही होती
हमें पता नही चलता
और किसी दिन यूँ ही
विस्मृति के गहरे रिसाइकिल बिन मे
आपाधापी के गहन ब्लैक-होल मे
समा जाएंगे हम भी
और दुनिया को खबर नही होगी
दुनिया को पता नही चलेगा

और बदल दिया जाएगा कैलेंडर.


(हिंद-युग्म पर पूर्व प्रकाशित)

(चित्र आभार-गूगल)

Thursday, December 17, 2009

समय की अदालत में



क्षमा कर देना हमको
ओ समय !
हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
हमारे अपराध के लिये
कि बस जी लेना चाहते थे हम
अपने हिस्से की गलीज जिंदगी
अपने हिस्से की चंद जहरीली साँसें
भर लेना चाहते थे अपने फेफड़ों मे
कुछ पलों के लिये ही सही
कि हमने मुक्ति की कामना नही की
बचना चाहा हमेशा
न्याय, नीति, धर्म की परिभाषाओं से
भागना चाहा नग्न सत्य से.

कि हम अपने बूढे अतीत को
विस्मृति के अंधे कुँए मे धकेल आये थे
अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
बॉटम्स अप !
कि हम बस जी लेना चाहते थे
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से की जमीन
अपने हिस्से की खुशी
नहीं बाँटना चाहते थे
अपने बच्चों से भी

कि हम बड़े निरंकुश युग मे पैदा हुए थे
ओ समय
उस मेरुहीन युग में
जहाँ हमें आँखें दी गयी थीं
झुकाये रखने के लिये
इश्तहारों पर चिपकाये जाने के लिये
हमें जुबान दी गयी थी
सत्ता के जूते चमकाने के लिये
विजेता के यशोगान गाने के लिये
और दी गयी थी एक पूँछ
हिलाने के लिये
टांगों के बीच दबाये रखने के लिये

कि जिंदगी की निर्लज्ज हवस मे हमने
चार पैरों पर जीना सीख लिया था
सीख लिया था जमीन पर रेंगना
बिना मेरु-रज्जु के
सलाखों के बीच रहना,
कि हमें अंधेरों मे जीना भाता था
क्योंकि सीख लिया था हमने
निरर्थक स्वप्न देख्नना
जो सिर्फ़ बंद आँखों से देखे जा सकते थे
हमें रोशनी से डर लगने लगा था
ओ समय !

जब हमारी असहाय खुशियाँ
पैरों मे पत्थर बाँध कर
खामोशी की झील मे
डुबोयी जाती थीं,
तब हम उसमे
अपने कागजी ख्वाबों की नावें तैरा रहे होते थे

ओ समय
ऐसा नही था
कि हमें दर्द नही होता था
कि दुःख नही था हमें
बस हमने उन दुःखों मे जीने का ढंग सीख लिया था
कि हम रच लेते थे अपने चारो ओर
सतरंगे स्वप्नो का मायाजाल
और कला कह देते थे उसे
कि हम विधवाओं के सामूहिक रुदन मे
बीथोवन की नाइन्थ सिम्फनी ढूँढ लेते थे
अंगछिन्न शरीरों के दृश्यों मे
ढूँढ लेते थे
पिकासो की गुएर्निक आर्ट
दुःख की निष्ठुर विडम्बनाओं मे
चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
और यातना के चरम क्षणों मे
ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे कर
सुला दिया था हमने
हमारे आत्माभिमान ने खुद
अपना गला घोंट कर आत्महत्या कर ली थी

हम भयभीत लोग थे
ओ समय !
इसलिये नही
कि हमें यातना का भय था,
हम डरते थे
अपनी नींद टूटने से
अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे
अपनी कल्पनाओं का हवामहल
ध्वस्त होने से हम डरते थे,
उस निर्दयी युग मे
जब कि छूरे की धार पर
परखी जाती थी
प्रतिरोध की जुबान
हमें क्रांति से डर लगता था
क्योंकि, ओ समय
हमें जिंदगी से प्यार हो गया था
और आज
जब उसकी छाया भी नही है हमारे पास
हमें अब भी जिंदगी से उतना ही प्यार है

हाँ
हमे अब भी उस बेवफ़ा से उतना ही प्यार है !



(हिंद-युग्म पर पूर्वप्रकाशित)

(चित्र: गुएर्निका-पिकासो)

Wednesday, November 25, 2009

और वक्त के साथ...


हाँ
वह भी कोई वक्त ही हुआ करता था
जब तुम्हारे इंतजार की राह पर दौड़ती
मेरी मासूम बेसब्री के
नाजुक पाँवों मे चुभ जाते थे
घड़ी की सुइयों के नुकीले काँटे
और जब
पाँव के छालों की थकान से रिसते
नमकीन आँसू हमारी रातों को जगाये रखते थे

वह भी कोई रातें हुआ करती थीं
जब कि हम
एक जोड़ी खाली हाँथों को
एक जोड़ी खाली जेबों के हवाले कर
अपने पैरों की जवाँ थकान
आवारा सड़कों के नसीब मे लिख देते थे
और
रात के काँपते गीले होठों पर
फ़ड़फ़ड़ा कर बैठ जाता था
कोई नाम

वह भी कोई शामें हुआ करती थीं
कि न हो कर भी
तुम मेरे इतने करीब हुआ करते थे
कि वक्त एक शरारती मुस्कान दाँतो तले दबाते हुए
’एक्स्क्यूज़ मी’ कह कर
कमरे से बाहर निकल जाता था
दबे पाँव

हाँ
वह भी कोई मौसम हुआ करता था
जब दिल की जेबें तुम्हारी यादों से
हमेशा भरी रहती थीं
और तुम्हारे अनलिखे खतों की खुशबू
हमारी रातों को रातरानी बना देती थी

और
जब किसी को प्यार करना
हमें दुनिया का सबसे जरूरी काम लगता था

मगर तब से
कितना पानी बह गया
मेरे पुल के साये को छू कर

और दुनिया की भरी-पूरी भीड़ मे
उसी गिरहकट वक्त ने काट ली
तुम्हारी यादों से भरी मेरे दिल की जेब
और मैं अपना चेहरा
किन्ही आइने जैसी शफ़्फ़ाक दो आँखों मे
रख कर भूल गया हूँ

अब
रात-दर-रात
मेरी पैनी होती जरूरतें
मेरे पराजित ख्वाबों का शिकार करती जाती हैं
और सुबह-दर-सुबह
मेरे पेट की आग जलाती जाती है
तुम्हारे अनलिखे खुशबूदार खत

और अब
जबकि जिंदगी के शर्तनामे पर
मैने अपनी पराजय के दस्तख़त कर दिये हैं
मैं तुम को हार गया हूँ
और अपने कन्धों पर
जिंदगी का जुँआ ढोने के बाद
मेरी थकी हुई शामें
भूलती जाती हैं
तुम्हारा नाम
हर्फ़-दर-हर्फ़

और घड़ी के नुकीले काँटे
जो कभी तुम्हारे इंतजार की राह पर दौड़ती
मेरी मासूम बेसब्री के
नाजुक पाँवों मे चुभ जाते थे
अब मेरी जरूरतों के पाँच-साला ’टाइमटेबल’ को
’पिन’ करने के काम आते हैं.
....
और खुदगर्ज वक्त
’विलेन’ सा हँसता रहता है.



(चित्र: पैरानोइया-सल्वाडोर डॉली)

Friday, October 30, 2009

बवालों सी रातें


फ़सादों से दिन हैं, बवालों सी रातें
जवानी की सरकश मिसालों सी रातें


अदद नौकरी की फ़िकर मे कटा दिन
कटें कैसे, भूखे सवालों सी रातें


उजालों मे झुलसे नजर के शज़र जब
बनी हम-सफ़र, हमखयालों सी रातें


जो खिलता अगर तेरी कुर्बत का चंदा
निखर जातीं दिन के उजालों सी रातें


हो जायेगी सूनी
ये महफ़िल भी इक दिन
रहेंगी बची, प्यासे प्यालों सी रातें


ये शाम-ओ-सहर का हटाओ भी परदा
खिलें दिन मे, शर्माये गालों सी रातें


बिखर जायें छन-छन, सितारे फ़लक पे
खुलें जब, तेरे काले बालों सी रातें


गम-ए-बेवफ़ाई, फिर उस पे ’रिसेशन’
दिवानों की निकलीं दिवालों सी रातें



(सरकश- ढीठ, विद्रोही; शजर- वृक्ष; कुर्बत- साथ, निकटता )

(हरकीरत जी और गौतम साहब की सलाह पर संशोधित)

Monday, October 12, 2009

त्रिवेणी-नुमा - १

तेरी पहचान के रैपर्स उड़ा दिये हवा में, हँस कर
वक्त ने तेरे नाम की टॉफ़ी, फिर लबों पे रख ली है

मेरी नाकामियों मुबारक हो, बस वो भी पिघल जायेगी

*****

बचपन में, मेले से, लाया था एक मिट्टी की गुल्लक
रोज डालता था कुछ सिक्के, भरता था छोटी सी गुल्लक

भरते-भरते पैसे, जाने कब खाली कर दी उम्र की गुल्लक

*****

कहते हैं सिकुड़ के माउस बराबर रह गयी है बेचारी दुनिया
इंटरनेट, केबल, मोबाइल्स ने खत्म कर दी हैं सारी दूरियाँ

हाँ, तेरा दिल ही छूट गया होगा शायद, नेटवर्क कवरेज से बाहर

*****

(क्षेपक)

बुद्धत्व

पागल ही तो है
वह आवारा कवि
बेचैन हरदम, भावुक
जो पढ़ लेता है कुछ बुरी कविताएं
और उदास हो जाता है
देखता है कुछ बुरे उज़बक ख्वाब
और रो देता है
कैसे समझाऊँ उसे
कि रोना कितना तक़लीफ़देह होता है
और दिल ही दिल मे घुटना
सेहत के लिये कितना नुकसानदायक
कैसे बताऊँ उसे
कि यह जिंदगी भी बस
एक ख्वाब ही तो है;

वो देखता है कुछ मेरी आँखों मे
और फिर उदास हो जाता है
मुंह फ़िरा लेता है
क्या पता है उसे यह सब ?
मगर
मगर अब आँसू मेरी आँखों मे क्यों
या..
शायद टूटने वाली है क्या
मेरी भी नींद ?

( यह पोस्ट हमारे प्यारे दोस्त और बेहद उम्दा कवि दर्पण साहब को समर्पित )

Thursday, October 8, 2009

बेगुनाह होने के गुनाह मे

हाँ
इस सतरंगी, खूबसूरत ख़्वाबों वाली
खुदगर्ज़ दुनिया से
बस ढेला भर की दूरी पर ही
सफ़ेद कालर वाले आदमखोर अँधेरे ने
उस भदेस, निरीह बस्ती पर ढाये थे
पुलिसिया जुर्म,
हाँ
वहीं कहीं पर था
रात के ग़लीज़ गुनाहों का गवाह
एक डरा हुआ दश्त
जिसका गला काट कर उन्होने
उसकी लाश पर उगा दिया था
एक विद्रूप सा ठूँठों का शहर;

वहीं कहीं पर
कुछ लपलपाती लंपट जुबानों ने
कुछ पैने हिंसक नाखूनों ने
कुछ लोहे के सख्त हाँथों ने
दबोच लिया था
एक अशक्त, बूढ़े मौसम की
इकलौती, जवान हवा को,
वहीं कहीं पर
उन्होने गला घोंट कर की थी
एक मासूम चीख की भ्रूणहत्या;

हाँ
यहीं पर
कुछ सुलगते शब्दों को
सेंसर के सींखचे मे ठूँसा गया था,
यहीं पर
कुछ जवान बगावती ख्वाबों को
आँखों की देहलीज से
ताउम्र जलावतन कर दिया गया था,
यहीं पर
एक पागल कलम की रगों मे
रोशनाई की बजाय जहर भरा गया था,
यहीं पर
ज़मीन की कोख़ मे
बारूद बो कर बंजर कर दिया गया था,
यहीं पर
कुछ गुमनाम शख़्सों को
लटकाया गया था
लोहे की सख़्त सलीबों पर
जिनकी जुबान ने
पालतू होने से इनकार कर दिया था

इसी जगह पर
बेरहम, बहरे बूटों ने
बेजुबान, अधेड़ पीठों पर
कायम की थी
एक नृशंस सल्तनत,
इसी जगह पर
एक समूची भाषा को
जिन्दा दफ़्न कर दिया गया था
आदिम होने के अपराध में,
इसी जगह पर
कुछ ज़मीनी खुदाओं की बलि दी गयी थी
किन्ही आसमानी ख़ुदाओं के नाम पर,
इसी जगह पर
माज़ी के एक पुराने पुल को
जला दिया गया था
कि एक अजन्मे कल को
कभी न दिखें
एक मृतप्राय कल के
रक्तरंजित पदचिह्न
किसी अंधी नैतिकता के
कोमल पाँवों मे न चुभें
सच के काँटे;

हाँ
यहीं
इसी जगह पर
एक पूरी सभ्यता को
असभ्य होने के अपराध में
बेगुनाह होने के गुनाह मे
दे दिया गया था
मृत्युदंड.

मगर हाँ
इसी जगह पर
कल

बारूद की पकी फ़स्लों मे
आग के सुर्ख फूलों को
खिलना है,
इसी जगह पर
कल
रात की कोख से
रोशनी के किसी बीज को
आग-हवा-पानी-मिट्टी पा कर
अखुँआना है
बनना है
कल का तिमिरनाशी, सुलगता सूरज,
इसी जगह पर
कल
लोहे की सख़्त सलीबों पर लटके
कुछ गुमनाम शख़्सों को
बनना है
मुस्तक़बिल का मसीहा ।
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